Used Car Buying Tips| Are Your Second Hand Is Accidental! This is how to identify; Keep These 7 things in mind When Buying Used car, You Won’t Have To regret it | आपकी सेकंड हैंड कार एक्सीडेंटल तो नहीं! ऐसे करें पहचान; पुरानी कार खरीदते समय इन 7 बातें का ध्यान रखें, पछताना नहीं पडे़गा

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नई दिल्ली32 मिनट पहले

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सेकंड हैंड कार खरीदने के लिए ऑनलाइन प्लेटफार्म पर आंख बंद करके विश्वास न करें, ऐसे सोर्स से गाड़ी खरीदें जहां गाड़ी और गाड़ी मालिक दोनों सामने हों।

  • मैकेनिक पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करना पड़ सकता है भारी, कमीशन के चक्कर में आपसे झूठ बोला जा सकता है
  • डीलर्स का कार कलेक्शन देखकर इम्प्रेस न हों, अगर काफी बड़ा डिस्काउंट दिया जा रहा है तो सोच-समझ कर निर्णय लें

महामारी के कारण लोग पब्लिक ट्रांसपोर्ट से ज्यादा खुद के वाहन को प्राथमिकता दे रहे हैं। कुछ लोग नया वाहन खरीद रहे हैं, तो कुछ का रुझान सेकंड हैंड वाहनों की तरफ है। लेकिन हाल ही में कई ऐसे मामले सामने आ चुके हैं, जिसमें ऑनलाइन सेकंड-हैंड वाहन खरीदने के चक्कर में ग्राहक धोखाधड़ी का शिकार हो गए, हालांकि कई बार लोकल मार्केट से सेकंड हैंड वाहन खरीदते समय भी ग्राहकों को ठग लिया जाता है। अगर आप भी सेकंड हैंड कार खरीदने का सोच रहे हैं, तो इस रिपोर्ट में पढ़ें कि खरीदारी करते समय आप कैसे सुरक्षित रहे सकते हैं…

1. मैकेनिक पर जरूरत से ज्यादा भरोसा न करें

  • कई बार लोगों को कहते सुना होगा कि सेकंड हैंड कार खरीदने जा रहे हों, तो गाड़ी चेक करने के लिए खुद का मैकेनिक लेकर जाना चाहिए। लोग ऐसा करते भी हैं और यहीं से शुरू हो जाती है हमारी परेशानियां। यूज्ड कार डीलर सूर्या यादव ने हमें बताया कि अक्सर लोग सेकंड हैंड कार पसंद करने आते हैं तो अपना मैकेनिक साथ लेकर आते हैं। उसके बाद मैकेनिक के बोलने पर ग्राहक आंख बंद करके कार खरीद भी लेता है। यही उनकी सबसे बड़ी गलती होती है कि वह मैकेनिक पर जरूरत से ज्यादा भरोसा कर लेते हैं।
  • उन्होंने बताया कि मैकेनिक और डीलरों का एक दूसरे से आए दिन काम पड़ता रहता है क्योंकि दोनों एक दूसरे पर निर्भर हैं जबकि ग्राहक का मैकेनिक से कभी कभार ही काम पड़ता है। ऐसे में कोई भी मैकेनिक हो, सभी का कमीशन बंधा होता है, फिर चाहें ग्राहक उसे अपने साथ ही क्यों ना लाया हो। अगर कार बिकती है तो दो से तीन हजार रुपए का कमीशन मैकेनिक का तय हो जाता है, और ग्राहक को इस बात का पता भी नहीं चलता कि वह ठगा जा चुका है। इसलिए मैकेनिक पर जरूरत से ज्यादा विश्वास न करें क्योंकि वो अपने कमीशन के चक्कर में आपसे झूठ बोलने से पहले जरा भी नहीं सोचेगा, ताकि डीलर से उसका काम चलता रहें।

2. डीलर के कार कलेक्शन को देखकर इम्प्रेस न हों

  • अक्सर लोग यूज्ड कार डीलर्स का कार कलेक्शन देखकर इम्प्रेस हो जाते हैं और मन में ये धारणा बना लेते हैं कि इसके पास ज्यादा गाड़ियां हैं तो यह अच्छा डीलर होगा। लेकिन यहीं पर ग्राहक फिर धोखा खा जाता है। क्योंकि ऐसे डीलर सभी प्रकार की गाड़ियां ले लेते हैं, फिर चाहें वो अच्छी हो या उनमें कोई खराबी हो।
  • उसके बाद डीलर गाड़ियों का रंग-रोगन करवा कर या उनमें थोड़ा काम करवाकर उन्हें बेचने के लिए डिस्प्ले में लगा देता है। गाड़ी में यदि कोई प्रॉब्लम भी होती है तो मैकेनिक इतनी सफाई से लिपा-पोती करते हैं कि आम इंसान का समझ पाना नामुमकिन हो जाता है और ग्राहक बड़े स्टॉक के दिखावे में आकर उन पर विश्वास करके गाड़ी खरीद लेता है। इस समस्या से बचने के लिए ऐसे डीलर के पास जाएं, जिसके पास लिमिटेड स्टॉक हो लेकिन अच्छा स्टॉक हो।

3. जरूरत से ज्यादा डिस्काउंट मिल रहा है, तो कुछ गड़बड़ हो सकती है

  • कई बार डीलर एक्सीडेंटल गाड़ी ले लेते हैं और उसमें काम करवा कर उसका अच्छी तरह से रंग-रोगन कर उसे बेचने के लिए खड़ी कर देते हैं। गाड़ी को जल्द से जल्द निकालने के चक्कर में डीलर ग्राहकों का 30 से 40 हजार या उससे ज्यादा का भी डिस्काउंट दे देते हैं और ग्राहक सोचता है कि मैंने पैसे कम करवा लिए या यह मेरे बजट में आ रही है और फिर धोखा खा जाता है।
  • अगर डीलर बड़ा डिस्काउंट दे रहा है और गाड़ी की तारीफों के पुल बंध रहा है तो थोड़ा सतर्क हो जाने की जरूरत है, क्योंकि अगर चीज अच्छी होगी तो कोई भी उसकी कीमत से कॉम्प्रोमाइज नहीं करेगा लेकिन अगर कुछ गड़बड़ होगी तो ज्यादा से ज्यादा डिस्काउंट देकर गाड़ी निकालने की हर संभव कोशिश करेगा। इसलिए अगर जरूरत से ज्यादा डिस्काउंट मिले तो लालच में न आएं बल्कि सोचें कि डीलर अचानक से इतना बड़ा डिस्काउंट क्यों दे रहा है।

4. ऑनलाइन से ज्यादा ऑफलाइन को प्राथमिकता दें

  • इस समय ऑनलाइन ठगी के रोजाना कई मामले सामने आ रहे हैं, जिसमें जालसाज डीलरों की ही गाड़ी अपने नाम से ऑनलाइन प्लेटफार्म पर डाल देते हैं वो भी बेहद कम कीमत पर, खुद की पहचान आर्मी वाले के तौर पर बता कर लोगों को अपने जाल में फंसाते हैं और उनसे पैसे ऐंठ लेते हैं।
  • इसलिए ऑनलाइन प्लेटफार्म के चक्कर में ना पड़े और किसी पर भी आंख बंद करके विश्वास न करें नहीं तो महंगा पड़ सकता है। बेहतर होगा कि गाड़ी फिजिकली देख कर खरीदें ताकि तसल्ली से देखा-परखा जा सके। इससे फायदा ये होगा कि गाड़ी और गाड़ी मालिक दोनों आपके सामने होंगे और आप बेहतर तरीके से निर्णय ले पाएंगे।

5. गाड़ी देखकर उत्साहित न हो, बल्कि उसे चलाकर देखें

  • अक्सर देखने में आता है कि कुछ लोग गाड़ी देखकर उत्साहित हो जाते हैं और आपके इसी उतावलेपन को डीलर भांप लेता है फायदा उठाता है। वो कार की सारी खूबियां गिनाएगा अच्छी-अच्छी चीजें दिखाएगा, एसी चालू कर देगा, स्पीकर्स का साउंड सुना देगा, गाड़ी की चमक-दमक से रूबरू कराएगा और हम उसे सही मान लेते हैं। वो यह भी दिलासा देगा कि ‘बेफिक्र रहें! गाड़ी में कोई प्रॉब्लम नहीं आएगी’।
  • बेवजह उत्साहित होने की बजाए अपने विवेक से काम लें। गाड़ी की अच्छी तरह के पड़ताल करें। अगर आप अनुभवी नहीं भी हैं तो भी गाड़ी स्टार्ट कर केबिन में बैठकर या बाहर निकलकर उसके अनियमित साउंड और वाइब्रेशन का पता लगा सकते हैं। अगर कोई अनियमित साउंड या वाइब्रेशन होता है, तो डीलर से इसकी पूछे। हालांकि पुरानी गाड़ी में थोड़ा बहुत काम निकलता है, जो थोड़े बहुत खर्च में ठीक कराया जा सकता है, बस इंजन में प्रॉब्लम नहीं होना चाहिए।
  • इसके अलावा गाड़ी का कम से कम 2 से Three किमी. का ट्रायल जरूर लें, ताकि इसके इंजन, गियरबॉक्स को अच्छी तरह से चेक किया जा सके। कम से कम 1 से 2 किमी. गाड़ी चला लेने के बाद गाड़ी स्टार्ट रहने दें और बोनट खोल कर ऑयल डिप बाहर निकालें। अगर उस जगह से स्मोक आ रहा है या ऑयल के छींटे आ रहे हैं तो एक बार कंपनी में जरूर कंसल्ट कर लें, क्योंकि यह प्रॉब्लम तब आती है, जब इंजन सही तरह से काम नहीं कर रहा होता। कोशिश करें कि सर्टिफाइड कार ही खरीदें।

6. गाड़ी एक्सीडेंटल तो नहीं है, ऐसे चेक कर सकते हैं
पहला:
गाड़ी एक्सीडेंटल तो नहीं एक आम आदमी के लिए इसका पता लगाना मुशिकल है लेकिन एक्सपर्ट ने बताया कि डूम, पिलर और चेसिस से इसका पता लगाया जा सकता है। गाड़ी के चेसिस को नीचे की तरफ से चारों और से देखें कि कहीं कोई प्ले या बेंड तो नहीं, अगर कहीं प्ले या बेंड दिखाई पड़ता है, तो कुछ गड़बड़ हो सकती है।
दूसरा: बोनट खोलकर इंजन के पीछे वाला हिस्सा जहां सस्पेंशन दिखाई देते हैं वहां देखें। यहां आपको डूम दिख जाएंगे, जिसके ऊपर सस्पेंशन टिका होता है। एक्सीडेंट होने पर सबसे पहले यही हिस्सा क्षतिग्रस्त होता है। इस पर कंपनी की पेस्टिंग होती है। एक्सीडेंट होने पर यदि एक बार पेस्टिंग निकल जाए, तो फिर इसे दोबारा नहीं बनाया जा सकता। कंपनी सिर्फ नई गाड़ियों पर पेस्टिंग करके देती है, पुरानी गाड़ी पर दोबारा पेस्टिंग नहीं करती। तो डूम की पेस्टिंग देख कर आप गाड़ी के एक्सीडेंटल होने का पता लगा सकते हैं।
तीसरा: इसके अलावा पिलर्स से भी काफी हद तक गाड़ी के एक्सीडेंटल होने का पता लगाया जा सकता है। जैसे ही दरवाजे खोलेंगे तो वहां पिलर्स पर लगी रबर को हटा कर देखें, यहां बहुत सारे डॉट नजर आएंगे, अगर इन डॉट में कहीं से क्रेक या जॉइंट दिखाई दें, तो भी गाड़ी के एक्सीडेंटल होने का पता लगाया जा सकता है।
चौथा: गाड़ी को बिल्कुल समतल जगह पर खड़ी कर लें। हैचबैक गाड़ी है तो कार से 6 से 7 फीट और अगर एसयूवी है तो 9 से 10 फीट दूर जाकर सेंटर में खड़े हो जाएं और गाड़ी की बनावट को ध्यान से देखें, इसे प्रोसेस गाड़ी के बैक साइड से भी करना है। अगर आपको दोनों तरफ से गाड़ी की बनावट में कोई अंतर दिख रहा है (यानी कुछ झुका या उठा हुआ दिख रहा है) तो इससे भी अंदाजा लगाया जा सकता है कि गाड़ी एक्सीडेंटल हो सकती है। इसकी पुष्टि करने के लिए जिस तरफ से डाउट हो, उस तरफ की रबर खोलकर पिलर्स की पेस्टिंग चेक कर सकते हैं। क्योंकि एक बार पेस्टिंग बिगड़ जाने पर उसे दोबारा उसी फिनिशिंग से बनाना मुश्किल है।

7. जब तक पूरे पेपर्स न मिलें, गाड़ी न खरीदें

डीलर्स के पास गाड़ियां कई जगहों से आती है। ज्यादातर शोरूम से एक्सचेंज कराई गई गाड़ी होती है, तो कुछ सीधे ग्राहकों ही बेचने के लिए दे जाते हैं। सेकंड हैंड गाड़ी खरीदें तो इन डॉक्यूमेंट्स पर ध्यान दें…

रजिस्ट्रेशन कार्ड (RC): यह गाड़ी का सबसे जरूरी दस्तावेज है या कह सकते हैं इस पर गाड़ी की पूरी कुंडली होती है। गाड़ी कब बनी, कब रजिस्टर्ड हुई, मॉडल नंबर, चेसिस नंबर, कलर, बॉडी टाइप सब कुछ इस कार्ड पर होता है। सेकंड हैड गाड़ी खरीदते वक्त सबसे पहले उसका रजिस्ट्रेशन कार्ड चेक करें। कार्ड पर देखें कि गाड़ी पर कोई लोन तो नहीं है। इस बात की जानकारी कार्ड के सबसे निचले हिस्से में दी होती है, गाड़ी जिस बैंक से फाइनेंस होती है उसका नाम नीचे ही लिखा होता है। अगर RC पर बैंक का नाम लिखा है, तो सबसे पहले कार बेचने वाले से बैंक की NOC जरूर ले लें वरना गाड़ी ट्रांसफर कराने में दिक्कत आएगी। गाड़ी फाइनेंस है या नहीं इसकी जानकारी आप RTO के साइट पर जाकर Hypothicated ऑप्शन पर क्लिक करके भी देख सकते हैं।

संबंधित थाने में जाकर क्राइम रिपोर्ट निकवाएं: RTO पर आपको एड्रेस मिल जाएगा, तो भविष्य में किसी भी तरह की समस्या से बचने के लिए सबसे पहले संबंधित थाने में जाकर गाड़ी की क्राइम रिपोर्ट निकलवाएं। यह पुलिस हेडक्वाटर (PHQ) से भी निकलवाई जा सकती है। इससे ये पता चलेगा कि कहीं आपके द्वारा खरीदी जा रही गाड़ी किसी तरह के क्राइम में इस्तेमाल तो नहीं हुई या उस पर किसी तरह का केस तो नहीं है। साथ ही संबंधित क्षेत्र के RTO से गाड़ी के ऊपर किसी प्रकार के चालान होने ना होने की जानकारी भी ली जा सकती है, वरना यह आपके लिए सरदर्द बन सकता है।

सेल लेटर की अहमियत समझें: गाड़ी बेच रहे हों या खरीद रहें हों ऐसे में सेल लेटर काफी अहम दस्तावेज है। गाड़ी बेच रहें हों तो RTO में जाकर सेल लेटर पर साइन करना ना भूलें ताकि भविष्य में गाड़ी से कोई दुर्घटना होती है, तो आप जिम्मेदार नहीं होंगे, जिसे गाड़ी बेची है उसके साथ एक एग्रीमेंट भी कराया जा सकता है। ठीक इसी प्रकार गाड़ी खरीदते समय भी सेल लेटर की अहमियत को समझें और डीलर (या जिससे भी कार खरीद रहे हों) से सेल लेटर जरूर मांगे, जिस पर RTO की सील और साइन लगे होते हैं, ताकि गाड़ी अपने नाम कराने में कोई दिक्कत न हो।

नोट- सभी पॉइंट्स यूज्ड कार डीलर सूर्या यादव (रिलाएबल कार जोन, भोपाल) से बातचीत के आधार पर

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